इक दास्तान सुनाता हूं, कुछ यूं हुआ।
सब बोलते रहे,
एक दूसरे की सुनते रहे।
जब नज़र गई एक कोने में
कुछ अजीब नज़रों से देखा गया
फिर बस यही पूछा गया
तुम ऐसे क्यों बैठे हो चुपचाप?
कुछ बोलते क्यों नहीं?
क्यों इस तरह गुमसुम हो?
जब वो सवाल सुनने लगा
सबकी टेढ़ी नजर को देखने लगा
तो सिर्फ इतना ही बोला -
हूं ख़ामोश तो ख़ामोश ही रहने दो
इस शांत मन को शांति ही रहने दो।
ग़र ये लब खुले तो हो जाओगे तबाह,
हैं जो भी सवाल, उसे अंदर ही दबा रहने दो।
इस दिल में छुपी है कई बात, जो सुन न पाओगे
न खुश हो पाओगे, न दुखी हो पाओगे।
आ जाएगा बवंडर, बातों के लहरों में छिपकर,
न खुद बच पाओगे, न किसी को बचा पाओगे।
कोशिश भी नहीं करना, इस दिल में झांकने की
हो जाओगे ख़ाक बस इक पल में ही।
रखो खुद को संभाल कर इस बेदर्द जहां में
नहीं तो ज़ख्म लिए फिरोगे
इस तरह जमाने में ही।
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