शनिवार, 24 मार्च 2018

विद्रोह की आग

मैं बेखबर था, अपने शहर से
मैं शांत था, अपने कर्मों से |
पर जब कुछ असामान्य लोगों ने
हमारे शहर को खत्म कर दिया
तब मेरे अंदर का शत्रु जाग गया |
मेरे मित्रों ने, मेरे करीबी लोगों ने मुझे समझाया
लेकिन मेरा क्रोध फिर भी कम न हुआ
और मैं प्रतिषोध के लिए निकल गया |
मैंने ठान लिया और सोच लिया
इस घात का प्रतिघात लेकर ही लौटूंगा |
जिन्होंने हमें यह जख्म दि है
उनकी अब जान जाएगी |
जिन्होंने हमारी आवाज रोकी है
उनकी अब सांस रूकेगी |
जब मैं उनके इलाके पहुंचा
तो पहले खुद को तैयार किया
फिर उन्हें ढूंढना शुरू किया |
कुछ वक्त बीता, कुछ साल बीते
लेकिन उन लोगों को खत्म कर दिया
और तब मेरे अंदर के विद्रोह का आग कम हुआ |

बुधवार, 8 नवंबर 2017

गु़फ्तगू - एक झलक

खौफ़ कर खुदा से, समझ ले इस दुनिया की रिव़ायत |
ग़र चाहता है तू और जीना, तो रख खुद को सलामत़ |
शैतान क्यों बना फ़िर रहा है, इस दुनिया में आकर,
यूं ही नहीं गिरती है, किसी के ऊपर क़यामत |

अचरज मत हो मेरी बातों से, मैं तेरा अपना ही हूँ
ग़ैरो की बातों में आकर, मत फैला इतनी द़हशत |
क्या बिगाड़ा है किसी ने तेरा, ज़रा बता दे वजह
क्यों ज़ुर्म का हाथ पकड़ के, कर रहा है ऐसी हरक़त |

मेरी नज़र से नज़र मिला ले, मुझको गला लगा ले
बख्श दे अब लोगों को, क्यों है तूझे इनसे नफ़रत |
अल्फाज़ पे ध्यान मत दे, भावनाओं को समझ
ग़र न रही इज़्ज़त-आबरू, तो कैसे होगी इनकी बरक़त |

मंगलवार, 24 अक्तूबर 2017

मेरी बेबसी

अनजान हैं, अजनबी हैं, पर होश में करते हैं
जिंदगी को मौत बना दिए, फिर भी नासमझ बने हैं |
खुशी के दिन को ग़म में भरकर
मेरी बेबसी का फायदा उठा रहे हैं |

ग़म मिटाते हैं, धुएँ उड़ाते हैं, सबको रुला रहे हैं
कुछ नाचीज़, तहज़ीब खो कर,  तकल्लुफ़ निभा रहे हैं |
सलामत हो कर भी तकलीफ में हैं
और हमें रुक - रुक कर चलना बता रहे हैं |

जिंदगी की कीमत समझो, खुद को जगह पर लाओ
क्यों किसी का दर्द नहीं समझ रहे, हमें भी बताओ |
फूलों के गुलदस्ते पर काँटे मत भरो
ये नाज़ुक है दामन, इनसे गाँठ मत छुड़ाओ |

खुद के मतलब के लिए, पूरे श़हर को मत रूलाओ
प्रदूषित हो चुका शहर है, और गंदगी मत फैलाओ |
इसकी खूबसूरती से तुम्हें क्या है दुश्मनी
ज़ख़्मी हो चुके शहर के ऊपर, ज़रा मरहम तो लगाओ |