रविवार, 4 सितंबर 2022

गुमशुम मन

बाहर ठंडी बयार चल रही थी।

साथ में बारिश की बौछारें भी शोर कर रही थी।

घरों में पानी की बूंदें भी ऐसे गिर रही थी

मानो जैसे ऊपर वाले द्वारा

इंसानों की इम्तिहान ली जा रही थी। 


पुरूष अपने कामकाज में व्यस्त थे

स्त्रियां ललाट पर केशों को

समेटते हुए रसोइ मेंं दिखाई दे रही थी।

हम ये सोचने मेंं लगे थे

क्यों नहीं हमारी सोच

अच्छे सोच विचार कर रही थी। 


यही सोचते सोचते जैसे ही

आसमान में हमारी नजर गई

काली बदरी भी गायब हो चुकी थी।

कुछ देर के बाद,

एकाध घरों से पर्दे भी हट गए थे

और कामकाजी लोगों की

आवाजाही भी सामान्य ढांचे में

नजर आने लग गई थी।

रविवार, 10 जुलाई 2022

हाल-ए-महफिल

 न पूछो हाल-ए-दिल, तो बेहतर होगा इस दिल के लिए।

सवाल जो तुम्हारे मन में हैं, वो सही नहीं है महफिल के लिए।


पुराने जख्म जो फिर हरे हो गए, तो दर्द दूर तक फैल जाएगा,

मरहम भी जो छूट गया, तो बुरा होगा इस दिल के लिए।
 

बेसब्री से जो इंतेज़ार में हैं, शान-ए-महफिल के आगाज में,

ग़र वो रुठ गए, तो मनाना मुश्किल होगा संगदिल के लिए।


चाहने वाले हैं ये मेरे, इन सबके करीब ही रहने दो,

ये अगर दूर हो गए, फिर नहीं मिलेंगे मेरे मंजिल के लिए।


सुना था पहले, सुनेंगे हमेशा, जो कितने वक्त से साथ में हैं,

न कभी छोड़ा था, न कभी छोड़ेंगे, जो बैठे हैं अंजाम-ए-महफिल के लिए।
 

वक्त को बेवक्त न होने दो, ये वक्त फिर वापस नहीं आएगा,

वक्त जो बेवक्त हो गया, तो अच्छा नहीं होगा हर प्यारे दिल के लिए।

शुक्रवार, 6 मई 2022

बीते दौर की बात

दोस्तों, वो भी क्या दौर था ।
मुस्कुराते हुए चेहरे पर खुशियों का जोर था ।
जो मिलते थे सब एक जगह,
तो लगता था ऐसा,
चेहरे पर खुशनुमा भावनाओं का शोर था ।
उस दौर की भी अजब कहानी थी ।
जाते हुए नैनों पर आंसूओं की निशानी थी ।
कह जाते थे मिलेंगे जल्द ही,
बस अपना ख्याल रखना,
हर लबों पर सिर्फ इंतजार ही जबानी थी ।
क्या जानना चाहोगे उस दौर के बारे में ।
किस्से जो छिपे थे चाँद, सितारों और तारे में ।
क्या बच्चे, बड़े और बुजुर्ग,
हो जाते कभी दुखी, तो होते थे कभी खुश,
भावनाएं जो छिपाए नहीं छिपती थी,
किसी भी किनारे में ।
याद आएंगे जब भी बीते हुए दौर,
तो सिर्फ रोना ही आएगा ।
इस भागते हुए दौर में,
कोई ना साथ दे पाएगा ।
जो बीत गया, वो बीत गया,
उसे समय को भूल जाओ,
आने वाला वक़्त ही, आगे लेकर जाएगा ।