न कोई गुफ्तगू होगा, न हाल-ए-दिल बयां होगी,
बस दूर चले जाने की जिद्द होगी।
न कोई तकल्लुफ़ होगा, न तार्रुफ होगी,
बस मन ही मन में हर बात होगी।
न होगी गुंजाइश किसी बहस की,
न सामना बेवज़ह के बातों का होगा।
न होगी तकलीफ़ लड़ने झगड़ने की,
न सिलसिला किसी मुलाक़ातों का होगा।
न होगी शिक़ायत कोई भी चीज़ों की,
न मलाल किसी ख़ुशी या ग़म का होगा।
न रहेगा गिला शिकवा दिलों के बीच में,
दिलों का बात बस दिलों में ही छिपा रहेगा।
न मिलेंगी नज़रें, न कुछ नज़र अंदाज़ होगा,
आंखों में अश्क लेकिन लब शांत होगा।
कहने को होंगे अल्फाज़ बहुत सारे,
पर सुनने वाला वो दिल साथ न होगा।
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