Welcome to my Hindi poetry blog. This space is dedicated to realistic, meaningful, & profound Hindi poetry that reflects emotions, experiences, and the deeper facets of life. Through my words, my aim is to express feelings and thoughts with which many people can resonate. If you enjoy reading my poems and connect with them, I would be truly grateful. Your support and encouragement inspire me to continue sharing my creativity through poetry.
सोमवार, 10 जनवरी 2022
मन का प्रेम भाव
जैसे नीले गगन में चंद्रमा काले मेघा में छिप रहा।।
मनमोहक मुखड़े को देख जो मंद मंद मुस्कुरा रहा।
वो अपना हाल कुछ इस तरह बता रहा।।
प्रेम है वो बचपन का जिससे विवाह रचा लिया।
मंत्रमुग्ध था जिसके विचारों में, उसे जीवनसाथी बना लिया।।
मृगनयनी वो, प्रिय रूप वाली, प्रियसी उसे ही बना लिया।
चार दिवस हुए विवाह को, पर घबराहट अब तक नहीं जा रहा।।
ऐ प्राणनाथ, ऐ प्रियवर मेरे, उधर कहाँ तुम घूम रहे।
तुमसे करनी है कुछ बातें मुझे, तुम्हें कब से ढूंढ रहे।।
चलो नजदीक आ जाओ तुम मेरे, समय को बहुत नष्ट कर लिया।
जब से बंधे हैं वैवाहिक बंधन में, मौन रहकर काम चल रहा।।
सुनो प्रिय! एक वचन दो मुझे, किसी से ये बात नहीं कहोगी।
डर लग रहा है, थोड़ा परेशान हूँ, यदि तुम सुनना चाहोगी।।
पहले जरा-सा मुस्कुरा दो, बहुत हिम्मत से मैं कह रहा।
करता हूँ बहुत प्रेम तुमसे, पहली बार हृदय से तुम्हें बता रहा।।
प्रेम संबंध बचपन से बहुत मजबूत रहे, अब ये वैवाहिक रिश्ते से जुड़ गए।
था कठिन पर थोड़ी हिम्मत की, और हम एक दूसरे के हो गए।।
बहुत समय नष्ट कर लिया, अब अपने हृदय के भाव को कह रहा।
जितना तुम करती हो प्रेम मुझसे, मैं भी उतना ही तुमसे हमेशा से कर रहा।।
मंगलवार, 23 नवंबर 2021
रेल का सफर
रेल और रेल की पटरियों से सबका नाता पुराना है।
लोग बदल गए, उनके विचार बदल गए,
पर रेल अब भी उनके दिलों का दिवाना है।
सफर के दौरान जब खिड़कियों से लोग ताकते हैं
कुलहरों में चाय पीते हुए जब खुद को निहारते हैं।
मुसाफिर बने एक जगह से दूसरे जगह जाते हैं
खुद का मंजिल ढूंढने रेल को ही साथी बना लेते हैं।
पटरियों की जब धकधक की आवाज सुनाई देती है
सीटियों की आवाज जब लोगों को बुलाती हैं।
हम भी रेल को यह कह देते हैं-
सुनो! हमें हमारे घर तक छोड़ दो
अब दूरियां हमसे सही नहीं जाती है।
यात्रा में यात्री बनकर जब सामने वाले से पूछते हैं
आप जरा थोड़ा जगह देंगे।
सुबह से शाम जब बैठकर गुजार देते हैं
और रात को खाना खाने साथ हो जाते हैं
आखिर यही कह देते हैं- अच्छा, अब सो जाते हैं
कल सुबह फिर बातचीत करेंगे।
रेलगाड़ी और रेलयात्री भी बनकर
न जाने कितने रातें गुजार देते हैं।
थककर जब अपने घर पहुंचते हैं
घरवाले भी खुशी से हमारा स्वागत करते हैं
हम भी उनकी खुशियां बटोरकर
फिर से रेल के साथ सफर पर निकल जाते हैं।
रविवार, 23 मई 2021
महामारी से परेशान इंसान
इंसान की गलती ने इंसान को ही सबक सिखाया।
महामारी के बुने हुए जाल में हर एक को उलझाया।
घर में कैद हुआ जब घर से दूर रह रहा इंसान
कामकाज में व्यस्त रहने वाला जब परिवार के वक्त में समाया।
इस अदृश्य काल ने ना जाने कितने लोगों को मृत्यु के घाट पहुंचाया।
बीमारी से बांधकर सबसे पहले सभी लोगों से दूर करवाया।
कुदरत ने भी आखिर सबको ये एहसास दिलवाया
ऐसे तड़प क्यों रहे हो, आखिर तुमने ही तो ये धुंध है फैलाया।
पहली लहर में शहर में ही था, जब बुजुर्गों के हाल को बेहाल किया।
दूसरी लहर में गांवों में पांव फैलाया, अब युवाओं को इस बीमारी से तड़पाया।
कहर ढाया जब हर के ऊपर तब ये बात समझने लगा हर कोई
क्या गलती हुई थी हमसे, जो दूरियों में ही रिश्ते को रिश्ता बताया।
आने वाले वक्त को इस काल के जाल ने ये बतलाया।
कुछ वक्त के लिए ठहर जाओ, बुरे वक्त ने हर इंसान को है फंसाया।
तुम अब दुखी हो गए हो, खुशियों के पल ने तुम्हें पहले था चेताया
पर तुम अपनी नादानियों में भूल गए थे, इसलिए विधाता ने आईने में चरित्र दिखलाया।