शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

छूटता आँचल

है शौक वही, पर शौक नयी नहीं
है साथ वही, पर साथ नहीं
हूँ दूर सही, पर मजबूर नहीं
हूँ निर्भीक, पर नजदीक नहीं
है ये सब विचार उस मन से
है एक सवाल उन सब जन से
जो आ रहे हैं या जो जा रहे हैं
क्या वो मेरे हैं या क्या वो आपके थे ?
मित्र कहूँ या शत्रु, समझ नहीं मुझे आ रहा
पर मैं हूँ शांत, है एक विश्वास
आने-जाने वालों पर नहीं,
खुद पर है विश्वास
मेरा एक साथी है
जो समंदर के दूसरी छोर पर बैठा है
एक ऐसे छोर पर बैठा है
जहां से वो सिर्फ ये देख रहा है
ये सोच रहा है
की वो दिन कब आएगा
जिस दिन वो मुझसे मिल पाएगा

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

टूटी सड़क......(अर्धसत्य)

तुझमे और मुझमे बहुत फर्क है यारा
तू दिल के लिए खुश है
और मैं दिल से बहुत खुश हूँ
तुझे अपनों के साथ प्यार मिला
और मुझे गैरो ने हंसा दिया
रूठे यार को मनाना मुझे आता नहीं
और यार रूठ जाये तो मैं रह सकता नहीं
मेरे विचार कैसे बदल गए
ये मैं भी नहीं समझ पाया
जब ढूँढना चाहा खुद को
तो आईने में तड़पता चेहरा नज़र आया
ज़िंदगी में खुशी और हंसी सभी को चाहिए
तूने खुद को खुशी के माहौल में ढाले रखा
और मैं बेचैनी से खुशी तलाशता रहा
तू ज़िंदगी को करीब से जान रहा
पर मैं ज़िंदगी को करीब आने से रोक रहा
हर दिन हर पल यही सोचता हूँ
की जब कोई खुशी से मेरे साथ होगी
तो क्या मैं संयम के साथ रह पाऊँगा
पर एक ऐसा शख्स भी मुझे मिला
जिसने मुझे वो सब कुछ फिर से सिखाया
जो मैं हर समय से चाहता था
उसने मुझे जीना सिखाया
जीने के साथ हँसना सिखाया
और मुझसे बोला
अब खुद को कभी अंधेरे मे मत रखना
मैं तुम्हारे साथ हूँ
मैं तुम्हें प्यार दूँगा
मैं तुम्हारा सच्चा यार बनूँगा
पर तुम कभी आँसू मत बहाना
पर कभी-कभी ऐसा सोचता हूँ
क्या सच में ऐसा है ?
क्या सच में ऐसा होगा ?
लेकिन जब बीते हुए,
दर्द भरे लम्हे याद आते हैं
तो अचानक ऐसा ख्याल आ जाता है
जब मेरा दिल किसी के काबिल नहीं
जब मेरी हंसी किसी की खुशी नहीं
तो किसी के साथ मेरा जुड़े रहना जायज़ नहीं

रविवार, 31 जनवरी 2016

प्यार है या नशा ?

क्यूँ हो गया हूँ मैं गुमशुम ?
क्यूँ खो गया चैन और सुकून ?
क्यूँ लगने लगी है अब दूरी ?
क्या है मेरी मजबूरी ?
क्यूँ इस कदर मैं बेचैन हूँ ?
क्यूँ खुद से ही मैं परेशान हूँ ?
क्या दिलों में बसती है ज़िंदगी ?
क्या मुश्किलों में ही दिखती है हस्ती ?
मन में ऐसे सवाल क्यूँ आने लगे हैं
जैसे किसी को हम चाहने लगे हैं
लग रहा है जैसे
किसी के चाहतों ने पुकारा है
उलझनों के घेरे में
फंस गया ये दिल बेचारा है
प्यार हुआ तो ऐसा लगा
जैसे आखिर किसी ने
मुझे भी समझ लिया हो
मुझे अपना मान लिया हो
अब जब उसे सोचता हूँ
तो एक बेचैनी-सी होने लगती है
ऐसा क्यूँ लग रहा है
जैसे इश्क़ के तूफान किसी
खूबसूरत किनारे पर ले गए हो
जहां सूनेपन में भी खुशी हो
जहां उसके साथ ही समय
बिताने में ही दिल लग रहा हो
पर ज़िंदगी के साथ मौत से भी
इस तूफान में डर लग रहा हो
आखिर किसी ने सच ही तो कहा है ––
“मोहब्बत ना करना ज़िंदगी में !
बहुत ग़म भरे हैं इस दिल्लगी में !”