गुरुवार, 3 सितंबर 2020

बेसब्र तकलीफें

 कब तक रहेंगे हम ऐसे बैठे हुए

कब तक सुनेंगे बात हम हर किसी के ।

कोई तो होगा जो पहचानेगा हमारा हुनर

कोई तो देखेगा हमारे अंदर का सिकंदर ।


दिन बीता, महीने बीते,

अब तो साल भी आने को है ।

परेशान हैं, बेसब्र हैं

पर सवाल अब भी वही ज़हन में है ।


 लेकिन मौसम कुछ ऐसा हो गया है

कि पूरी दुनिया का बस यही सवाल है ।

हर इंसान इस सोच में डूबा हुआ है

इस समस्या का क्या समाधान है ।


फिर भी कोशिश कर रहे हैं पूरी तरह से

पर रास्ता नहीं दिख रहा है कोई छोर से ।

कुछेक मददगारों के शर्तें हजार हैं

इसलिए प्रयास में जुटे हुए हैं हर ओर से ।

सोमवार, 23 मार्च 2020

नकाबपोश चेहरे

आजकल नक़ाबों से छिपे चेहरे दिख रहे हैं।
हर चेहरे के पीछे एक नए चेहरे मिल रहे हैं।
आहिस्ता-आहिस्ता साथ चलते हैं ऐसे,
जैसे साथ में चलते हुए भी अकेले से लग रहे हैं।

वीरान-सा शहर, सूने-सूने से रास्ते
खालीपन-सी जिंदगी अब महसूस हो रहे हैं।
बातों का सिलसिला भी कुछ यूं खत्म हो रहा,
जैसे गुफ्तगू करने से भी लोग कतरा रहे हैं।

क्या अपने, क्या पराए, क्या दोस्त, क्या दुश्मन
हर कोई, हर किसी से जुदा होने का ग़म मना रहे हैं।
नहीं चाहते किसी से भी दूर रहना,
पर मजबूरियां में ही फासला बढ़ा रहे हैं।

बुधवार, 20 नवंबर 2019

अनसुलझी पहेली

कुछ अनसुलझी बातों को सुलझाने चला
बातों ही बातों में उसे मनाने चला।
छोड़ दो ये जिद्द, करो कुछ प्यार भरी बातें
क्या हो गई खता, जो नहीं हो रही कुछ बातें।
उसने जवाब दिया कुछ इस अंदाज में
जैसे राज छुपे थे उसके हर बात में।
नहीं पता तुम क्या चाहते हो, क्या है तुम्हारे दिल में
बता दिया होता तो नहीं होते तेरे दिल में।
बस नजरें मिलाई थी, जरा-सा मुस्कुराया था
कुछ बातें तुम्हारी सुनी थी, कुछ बातें तुम्हें बताया था।
क्यों रूठ गई, क्यों छूट गई, कुछ तो बात बता दो
अब न होगी कभी खता, चलो अपना हाल बता दो।
मेरी खबर मत पूछो, कोई भरोसे के काबिल नहीं
रास्ता वही, मंजिल वही, बस अनजानों का साहिल नहीं।
अनजानों की फिक्र छोड़ो, अपनों के साथ रहो
फिर से आपस का हाल जान लिया, अब सुकून के साथ रहो।