रविवार, 21 जून 2026

एक दिल... खोया हुआ और ख़ामोश

 इक दास्तान सुनाता हूं, कुछ यूं हुआ।

सब बोलते रहे,

एक दूसरे की सुनते रहे।

जब नज़र गई एक कोने में 

कुछ अजीब नज़रों से देखा गया 

फिर बस यही पूछा गया 

तुम ऐसे क्यों बैठे हो चुपचाप?

कुछ बोलते क्यों नहीं?

क्यों इस तरह गुमसुम हो?

जब वो सवाल सुनने लगा 

सबकी टेढ़ी नजर को देखने लगा 

तो सिर्फ इतना ही बोला -

हूं ख़ामोश तो ख़ामोश ही रहने दो 

इस शांत मन को शांति ही रहने दो।

ग़र ये लब खुले तो हो जाओगे तबाह,

हैं जो भी सवाल, उसे अंदर ही दबा रहने दो।

इस दिल में छुपी है कई बात, जो सुन न पाओगे 

न खुश हो पाओगे, न दुखी हो पाओगे।

आ जाएगा बवंडर, बातों के लहरों में छिपकर,

न खुद बच पाओगे, न किसी को बचा पाओगे।

कोशिश भी नहीं करना, इस दिल में झांकने की

हो जाओगे ख़ाक बस इक पल में ही।

रखो खुद को संभाल कर इस बेदर्द जहां में 

नहीं तो ज़ख्म लिए फिरोगे 

इस तरह जमाने में ही।

गुरुवार, 11 जून 2026

अलविदा जहां

न कोई गुफ्तगू होगा, न हाल-ए-दिल बयां होगी,

बस दूर चले जाने की जिद्द होगी।

न कोई तकल्लुफ़ होगा, न तार्रुफ होगी,

बस मन ही मन में हर बात होगी।


न होगी गुंजाइश किसी बहस की,

न सामना बेवज़ह के बातों का होगा।

न होगी तकलीफ़ लड़ने झगड़ने की,

न सिलसिला किसी मुलाक़ातों का होगा।


न होगी शिक़ायत कोई भी चीज़ों की,

न मलाल किसी ख़ुशी या ग़म का होगा।

न रहेगा गिला शिकवा दिलों के बीच में,

दिलों का बात बस दिलों में ही छिपा रहेगा।


न मिलेंगी नज़रें, न कुछ नज़र अंदाज़ होगा,

आंखों में अश्क लेकिन लब शांत होगा।

कहने को होंगे अल्फाज़ बहुत सारे,

पर सुनने वाला वो दिल साथ न होगा।

रविवार, 20 अक्टूबर 2024

वो पहला मिलन

चलो आज तुम्हें एक पुरानी यादें ताजा कराता हूँ।
मन की बातों को शब्दों की जुबानी बताता हूँ।
क्या तुम्हें वो पल याद है
जब हम पहली बार मिले थे?
जब हम एक-दूसरे से बिल्कुल अंजान थे।
नहीं ना!
लेकिन मुझे याद है
मौसम थोड़ा सुहाना था।
आकाश में बादल भी छाए हुए थे
सड़क पर थोड़ी-सी आवाजाही थी।
फिर हमने एक जगह बैठने की तय की
क्योंकि समय की भी पाबंदी थी
संयोग से दोनों को कॉफी पसंद थी।
तुमने अपने बारे में बताया
और मैंने अपने बारे में बताया।
बातों ही बातों में कुछ चीजें दोनों की मिलने लगी।
इस पहली मुलाकात के बाद
अक्सर ही हम मिलने लगे
एक-दूसरे को जानने लगे।
फिर एक ऐसी दोस्ती की शुरुआत हुई
जो वक्त के साथ और गहरी हो गई।
अब जब कभी हम मिलते हैं
कुछ ऐसी बातें भी साझा कर लेते हैं
जिससे दिल को सुकून मिल जाता है।

सोमवार, 12 फ़रवरी 2024

कहानी ... कुछ सवालों के साथ

कुछ अलग करने की जो अंदरुनी जिद्द थी।
इसे पाना सबसे बड़ी मुश्किल थी।
है सफर लंबा, ये मन को मालूम था।
बस शुरू करने के लिए रास्ते पर निकलना था।

थोड़ा समय खराब चल रहा था, लोग थोड़े नाराज थे।
कुछ हासिल जो करना था, सो कुछ खोए जा रहे थे।
कुछ बातें लगती थी अच्छी, कुछ बुरी लग रही थी।
कुछ चीजें दे रही थी खुशी, कुछ दुख पहुंचा रही थी।

मुकाम सोचा था ऐसा, जिसे पा लेना ही एकमात्र विचार था।
इस पर निशाना साधना ही, कोई ज्यादा बड़ा काम न था।
रूकने का कोई कारण न था, आगे बढ़ना में कोई बाधा न था।
ठानी है जो मन में, इसे छोड़ने का अब कोई इरादा न था।

चलो इस कहानी को यहीं विराम देते हैं।
क्यों न हम नई कहानी की बातें करते हैं।
कुछ बातें तुम बताओ, कुछ अपनी बताते हैं।
लेकिन इससे पहले, सबको साथ कर लेते हैं।

थे हम सब एक दूसरे के लिए बिल्कुल नए।
पहचान बनाने में ही कुछ ज्यादा वक्त बीत गए।
फिर हुआ कुछ ऐसा, माहौल बदल गया।
जैसे एक ही पल सबका असली रंग दिख गया।

कोई हुआ किनारा, कोई साथ चलता रहा।
कोई नए मुखड़े के साथ सबसे मिलता रहा।
कोई बना अनजान, कोई जानकर छिपता रहा।
कोई नजरें मिलाने से हर क्षण डरता रहा।

किसी ने माना दोस्त, किसी ने यारी खत्म की।
साथ बैठकर भी इशारों में बातें होती रही।
अंदर में रहे अच्छे, बाहर दूर खड़े रहे।
दिखावे की नजरों से हर जवाब दे गए।

सोमवार, 26 जून 2023

कुबूल है

वो लम्हें जो साथ बिताए
वो बातें जो साथ हुई
वो मुलाकातें जो हमने की
क्या तुम्हें कुबूल है?

वो हंसी ठहाके जो संग लगाए
वो हर पल जो खुशी से बीते
वो अपनी जो एक अच्छी यारी हुई
क्या तुम्हें कुबूल है?

वो वादे जो एक दूसरे से हमने लिए
वो कसमें जो साथ मिलकर खाई
वो नए रिश्ते जो हमारे बने
क्या तुम्हें कुबूल है?

वो रूठना मनाना जो हमने किया
वो दूर होकर पास आना जो हमेशा होते रहा
वो हर मुलाकात जो प्यारा बना
क्या तुम्हें कुबूल है?


रविवार, 23 अक्टूबर 2022

सुकून भरे कुछ पल

नदियां किनारे हैं बयार चल रही
आंधियां कितनी जोरों से बह रही।
हम भी इसका आनंद ले रहे
इस पल को खुलकर जी रहे।
बदलते मौसम में जो उपवन खिल रहे
फूलों के बागियों में मुस्कान ला रहे।
थोड़ी देर रूककर जब हम थोड़ा आगे बढ़े
बदलते हुए नजारों के संग हम चल पड़े।
कुदरती दांव पेच को जब समझना चाहा
लोगों ने मुस्कुराकर इससे किनारा कर लिया।
कहा- "ठहर जा, जरा संभल कर चल
इतनी तेज गति से तो मत निकल।"
हमने ये सब बातें सुन तो ली
पर समझ नहीं आ रहा, ये सही है या नहीं।
कुछ देर बाद इस सोच में डूब गए
लगता है साधारण छवि देखकर सब हमें छोड़ गए।
गंतव्य स्थान पर जब हम पहुंचे
चेहरे के हाव-भाव देख सवाल हुए कुछ ऐसे।
इतनी देर कहां लगा दी, कहां चले गए थे तुम
मिजाज भी बदला हुआ-सा है, लग भी रहे हो कुछ गुमसुम।
हमने भी जवाब दिया ऐसा, वो भी नहीं हुए परेशान
बताया थोड़े थक गए हैं, इसलिए हैं ये उदासी भरे निशान।

रविवार, 4 सितंबर 2022

गुमशुम मन

बाहर ठंडी बयार चल रही थी।

साथ में बारिश की बौछारें भी शोर कर रही थी।

घरों में पानी की बूंदें भी ऐसे गिर रही थी

मानो जैसे ऊपर वाले द्वारा

इंसानों की इम्तिहान ली जा रही थी। 


पुरूष अपने कामकाज में व्यस्त थे

स्त्रियां ललाट पर केशों को

समेटते हुए रसोइ मेंं दिखाई दे रही थी।

हम ये सोचने मेंं लगे थे

क्यों नहीं हमारी सोच

अच्छे सोच विचार कर रही थी। 


यही सोचते सोचते जैसे ही

आसमान में हमारी नजर गई

काली बदरी भी गायब हो चुकी थी।

कुछ देर के बाद,

एकाध घरों से पर्दे भी हट गए थे

और कामकाजी लोगों की

आवाजाही भी सामान्य ढांचे में

नजर आने लग गई थी।

रविवार, 10 जुलाई 2022

हाल-ए-महफिल

 न पूछो हाल-ए-दिल, तो बेहतर होगा इस दिल के लिए।

सवाल जो तुम्हारे मन में हैं, वो सही नहीं है महफिल के लिए।


पुराने जख्म जो फिर हरे हो गए, तो दर्द दूर तक फैल जाएगा,

मरहम भी जो छूट गया, तो बुरा होगा इस दिल के लिए।
 

बेसब्री से जो इंतेज़ार में हैं, शान-ए-महफिल के आगाज में,

ग़र वो रुठ गए, तो मनाना मुश्किल होगा संगदिल के लिए।


चाहने वाले हैं ये मेरे, इन सबके करीब ही रहने दो,

ये अगर दूर हो गए, फिर नहीं मिलेंगे मेरे मंजिल के लिए।


सुना था पहले, सुनेंगे हमेशा, जो कितने वक्त से साथ में हैं,

न कभी छोड़ा था, न कभी छोड़ेंगे, जो बैठे हैं अंजाम-ए-महफिल के लिए।
 

वक्त को बेवक्त न होने दो, ये वक्त फिर वापस नहीं आएगा,

वक्त जो बेवक्त हो गया, तो अच्छा नहीं होगा हर प्यारे दिल के लिए।

शुक्रवार, 6 मई 2022

बीते दौर की बात

दोस्तों, वो भी क्या दौर था ।
मुस्कुराते हुए चेहरे पर खुशियों का जोर था ।
जो मिलते थे सब एक जगह,
तो लगता था ऐसा,
चेहरे पर खुशनुमा भावनाओं का शोर था ।
उस दौर की भी अजब कहानी थी ।
जाते हुए नैनों पर आंसूओं की निशानी थी ।
कह जाते थे मिलेंगे जल्द ही,
बस अपना ख्याल रखना,
हर लबों पर सिर्फ इंतजार ही जबानी थी ।
क्या जानना चाहोगे उस दौर के बारे में ।
किस्से जो छिपे थे चाँद, सितारों और तारे में ।
क्या बच्चे, बड़े और बुजुर्ग,
हो जाते कभी दुखी, तो होते थे कभी खुश,
भावनाएं जो छिपाए नहीं छिपती थी,
किसी भी किनारे में ।
याद आएंगे जब भी बीते हुए दौर,
तो सिर्फ रोना ही आएगा ।
इस भागते हुए दौर में,
कोई ना साथ दे पाएगा ।
जो बीत गया, वो बीत गया,
उसे समय को भूल जाओ,
आने वाला वक़्त ही, आगे लेकर जाएगा ।

सोमवार, 10 जनवरी 2022

मन का प्रेम भाव

नया नवेला जोड़ा जो हौले हौले शरमा रहा।
जैसे नीले गगन में चंद्रमा काले मेघा में छिप रहा।।
मनमोहक मुखड़े को देख जो मंद मंद मुस्कुरा रहा।
वो अपना हाल कुछ इस तरह बता रहा।।

प्रेम है वो बचपन का जिससे विवाह रचा लिया।
मंत्रमुग्ध था जिसके विचारों में, उसे जीवनसाथी बना लिया।।
मृगनयनी वो, प्रिय रूप वाली, प्रियसी उसे ही बना लिया।
चार दिवस हुए विवाह को, पर घबराहट अब तक नहीं जा रहा।।

ऐ प्राणनाथ, ऐ प्रियवर मेरे, उधर कहाँ तुम घूम रहे।
तुमसे करनी है कुछ बातें मुझे, तुम्हें कब से ढूंढ रहे।।
चलो नजदीक आ जाओ तुम मेरे, समय को बहुत नष्ट कर लिया।
जब से बंधे हैं वैवाहिक बंधन में, मौन रहकर काम चल रहा।।

सुनो प्रिय! एक वचन दो मुझे, किसी से ये बात नहीं कहोगी।
डर लग रहा है, थोड़ा परेशान हूँ, यदि तुम सुनना चाहोगी।।
पहले जरा-सा मुस्कुरा दो, बहुत हिम्मत से मैं कह रहा।
करता हूँ बहुत प्रेम तुमसे, पहली बार हृदय से तुम्हें बता रहा।।

प्रेम संबंध बचपन से बहुत मजबूत रहे, अब ये वैवाहिक रिश्ते से जुड़ गए।
था कठिन पर थोड़ी हिम्मत की, और हम एक दूसरे के हो गए।।
बहुत समय नष्ट कर लिया, अब अपने हृदय के भाव को कह रहा।
जितना तुम करती हो प्रेम मुझसे, मैं भी उतना ही तुमसे हमेशा से कर रहा।।

मंगलवार, 23 नवंबर 2021

रेल का सफर



रेल और रेल की पटरियों से सबका नाता पुराना है।

लोग बदल गए, उनके विचार बदल गए,

पर रेल अब भी उनके दिलों का दिवाना है।


सफर के दौरान जब खिड़कियों से लोग ताकते हैं

कुलहरों में चाय पीते हुए जब खुद को निहारते हैं।

मुसाफिर बने एक जगह से दूसरे जगह जाते हैं

खुद का मंजिल ढूंढने रेल को ही साथी बना लेते हैं।


पटरियों की जब धकधक की आवाज सुनाई देती है

सीटियों की आवाज जब लोगों को बुलाती हैं।

हम भी रेल को यह कह देते हैं-

सुनो! हमें हमारे घर तक छोड़ दो

अब दूरियां हमसे सही नहीं जाती है।


यात्रा में यात्री बनकर जब सामने वाले से पूछते हैं

आप जरा थोड़ा जगह देंगे।

सुबह से शाम जब बैठकर गुजार देते हैं

और रात को खाना खाने साथ हो जाते हैं

आखिर यही कह देते हैं- अच्छा, अब सो जाते हैं

कल सुबह फिर बातचीत करेंगे।


रेलगाड़ी और रेलयात्री भी बनकर

न जाने कितने रातें गुजार देते हैं।

थककर जब अपने घर पहुंचते हैं

घरवाले भी खुशी से हमारा स्वागत करते हैं

हम भी उनकी खुशियां बटोरकर

फिर से रेल के साथ सफर पर निकल जाते हैं।

रविवार, 23 मई 2021

महामारी से परेशान इंसान

 इंसान की गलती ने इंसान को ही सबक सिखाया।

महामारी के बुने हुए जाल में हर एक को उलझाया।

घर में कैद हुआ जब घर से दूर रह रहा इंसान

कामकाज में व्यस्त रहने वाला जब परिवार के वक्त में समाया।

 

इस अदृश्य काल ने ना जाने कितने लोगों को मृत्यु के घाट पहुंचाया।

बीमारी से बांधकर सबसे पहले सभी लोगों से दूर करवाया।

कुदरत ने भी आखिर सबको ये एहसास दिलवाया

ऐसे तड़प क्यों रहे हो, आखिर तुमने ही तो ये धुंध है फैलाया।

 

पहली लहर में शहर में ही था, जब बुजुर्गों के हाल को बेहाल किया।

दूसरी लहर में गांवों में पांव फैलाया, अब युवाओं को इस बीमारी से तड़पाया।

कहर ढाया जब हर के ऊपर तब ये बात समझने लगा हर कोई

क्या गलती हुई थी हमसे, जो दूरियों में ही रिश्ते को रिश्ता बताया।

 

आने वाले वक्त को इस काल के जाल ने ये बतलाया।

कुछ वक्त के लिए ठहर जाओ, बुरे वक्त ने हर इंसान को है फंसाया।

तुम अब दुखी हो गए हो, खुशियों के पल ने तुम्हें पहले था चेताया

पर तुम अपनी नादानियों में भूल गए थे, इसलिए विधाता ने आईने में चरित्र दिखलाया।

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

उम्मीदों की सूरज


बेफिजूल की बातों में मुझे मत लाना।

नाजुक है दिल, इसे कैसे समझाना।

कैसे कहूँ, किससे कहूँ, क्या है मेरी दास्तां

नहीं चाहती औरों को अनसुनी बातों में उलझाना।

 

अपनों ने साथ जब हमारा छोड़ा।

हम हुए अकेले और मुसीबतों ने घेरा।

क्यों ऐसा लग रहा था जैसे अंधेरा साथ हो गया है,

छोटी सी थी मैं और नासमझी ने डाला हुआ था डेरा।

 

मेरे जन्मदाता के बीच कुछ यूं उलझी पहेली।

रौनक भरे जीवन में अशांति की लगी बोली।

पढ़ने की उम्र में, बढ़ने की उम्र में

बर्बादी की मायाजाल में फंसी उम्मीदों की झोली।

 

मैं भी डटी रही, हौसले के साथ मजबूत रही।

दिल की बजाए दिमाग की सुन रही।

आगे बढ़ना है, आत्मनिर्भर बनना है,

पर क्या करुं, कैसे करूं, समझ नहीं पा रही।

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

बेचारा मन

हर वक्त किसी को खोने का डर क्यों मन में रहता है।

ये बात और है जो दिल कुछ नहीं समझता है।

बस कुछ ऐसी भावनाएं मन में दौड़ती रहती हैं,

जिन्हें जानता नहीं, पहचानता नहीं,

उनसे ही जुड़े रहने का मन क्यों करता रहता है।

 

क्यों भाग रहा है वक्त, ठहर तो जा जरा-सा,

हम आहिस्ता-आहिस्ता खुद को संभाल लेंगे।

कुछ अपने, कुछ पराए को ये बात बता देंगे

नहीं मालूम रब ने किसको मेरे लिए चुना है

शायद इसलिए दिल परीक्षा देते रहता है।

 

बेबस, बेअदब, बेवफाओं के शहर में मन घूम रहा है

न जाने बेचारा दिल किसे ढूंढ रहा है।

रिश्ता जो कभी होगा नहीं, रिश्ता जो कभी बनेगा नहीं

वो रिश्ता जो मैं और तुम से हम कहलाएगा नहीं

उनके ही सोच में मन क्यों डूबा रहता है।

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

नाखुश जिंदगी

 

वो आज खुश हैं

खुद को ऊपर देखकर।

वो आज आजाद हैं

अपने पैरों पर खड़ा होकर।

पर अचानक हमें क्यों ईर्ष्या होने लगी

अपनी मंजिल को दूर देखकर।

हालात ऐसे हो रहे हैं

जैसे जमीन खिसक गई हमारे नीचे से होकर।

 

बेबस, बदहाल सी हो गई है जिंदगी

शुरू होने से पहले ही ठहर सी गई है जिंदगी।

वक्त कुछ इस तरह दौड़ रहा है

पीछे रह गए साथी को छोड़ रहा है।

हम कोशिश कर रहे हैं, ये दुआ भी कर रहे हैं

कोई ऐसा रास्ता तो मिले जो हम ढूंढ रहे हैं।

वक्त ऐसी परीक्षा लेगा, ये कभी सोचे न थे

ऐसे पत्थर मिलेंगे, हम जानते न थे।

 

अपने हुनर को क्या बयान करें

ओरों के सामने क्या आजमाइश करें।

खुद को देखते हैं जब आइने के सामने

बिगड़े हुए हालात से क्या फरमाइश करें।

बढ़ाए थे जब हमने अपने पहले कदम

खुशी ऐसी हुई जैसे मिल गया हो कोई हमदम।

सफर में मिलने लगे थे कुछ नए साथी

कुछ ऐसे भी मिले, जैसे बन गए हो वो हमराही।

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

अनकहे लफ्ज़

कभी बगान में आओ तो तुमसे कहूं।

कभी करीब आओ तो तुमसे कहूं।

ख्वाबों में रहने की अब जिद्द छोड़ दो,

कभी सामने आओ तो तुमसे कहूं।

 

कभी फूलों की तरह महको तो तुमसे कहूं।

कभी रंगो की तरह खिलो तो तुमसे कहूं।

गुमनाम जिंदगी जीने की अब जिद्द छोड़ दो,

कभी गहनों की तरह चमको तो तुमसे कहूं।

 

कभी फुर्सत में मिलो तो तुमसे कहूं।

कभी चाहतें करो तो तुमसे कहूं।

दूर-दूर रहने की अब जिद्द छोड़ दो,

कभी आहतें करो तो तुमसे कहूं।

 

कभी प्रेम दिखाओ तो तुमसे कहूं।

कभी गले मिलो तो तुमसे कहूं।

यूं ठहर जाने की अब जिद्द छोड़ दो,

कभी खुलकर मुस्कुराओ तो तुमसे कहूं।

बुधवार, 18 नवंबर 2020

मेरी कुछ बातें

मैं सोचता हूँ

हर दिन

कुछ करूँ नया।

सोचते-सोचते

कुछ न मिला

और वो दिन

बीत गया।


मेरा सवेरा होता था

कुछ खास

लम्हों के साथ।

बीतती थी मेरी रात

एक नए

सोच के साथ।


दीवार बन कर

खड़ी है 

उदासी मेरे दिल पर।

क्या करूँ, क्या न करूँ

बचकर रहता हूँ

इससे मैं घबराकर।


मैं अपनी

दिली-इच्छा से

बैठता हूँ

कोई नया काम करने।

लेकिन कुछ लोग

ऐसे मिल जाते हैं

जो लग जाते हैं

उसे रोकने।


मैं अपनी

उदासी भरी बात

आज कागज पर

व्यक्त कर रहा हूँ।

आप इसे

समझ सकते हैं तो समझें

नहीं तो मैं

कुछ खास नहीं कह रहा हूँ।


कोई भी काम

मैं ठीक से

नहीं कर पाता।

मेरे मन में

घबराहट गुंजती है

जिसे मैं

कह नहीं पाता।


मेरी कुछ बातें

दिलों में

किसी के नहीं जाती।

सब अपने में

रहते हैं मग्न

और मेरी बात

समझ में नहीं आती।

सोमवार, 7 सितंबर 2020

कहानी भारत की

वो वाल्मीकि, रहीम, तुलसी, कबीर

वो साईं साधु संत फकीर।

वो नेहरू, गांधी, बल्लभ, भीम

वो हर क्षण चौकसी करते वीर धीर।

वो गंगा, यमुना, सरयु की धारा

वो बागमती, गोमती की पुकार सुन जरा।


वो मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारा

वो सबका मालिक एक ही यारा।

वो अजान, पूजन, अरदास, प्रार्थना

हर जनमानस की एक ही याचना।

वो हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई

हर धर्मरक्षक की बस एक ही लड़ाई।


वो नेता, अभिनेता या हो श्रोता

हर किसी के चेहरे पर बसा है मुखौटा।

वो दिनकर, बच्चन या हो निराला

हर मौन सिपाही के हाथ में होता है शब्दों का मधुशाला।

वो फाल्के, मिल्खा या हो अटल

वो सिनेमा, खेल और राजनीति में रहे हैं प्रबल।


क्या उत्तर, क्या दक्षिण, क्या पूरब, क्या पश्चिम

हर भूभाग में है कई ऐतिहासिक पंछी।

वो वर्दी सिपाही की हो या हो फौजी की वर्दी

वो जान पर खेलने वाले होते हैं जांबाज खिलाड़ी।

यहां हर मोड़ पर बदलती है वाणी और पानी

यहां खाने, गाने से लेकर हर चीज में है कहानी।

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

बेसब्र तकलीफें

 कब तक रहेंगे हम ऐसे बैठे हुए

कब तक सुनेंगे बात हम हर किसी के ।

कोई तो होगा जो पहचानेगा हमारा हुनर

कोई तो देखेगा हमारे अंदर का सिकंदर ।


दिन बीता, महीने बीते,

अब तो साल भी आने को है ।

परेशान हैं, बेसब्र हैं

पर सवाल अब भी वही ज़हन में है ।


 लेकिन मौसम कुछ ऐसा हो गया है

कि पूरी दुनिया का बस यही सवाल है ।

हर इंसान इस सोच में डूबा हुआ है

इस समस्या का क्या समाधान है ।


फिर भी कोशिश कर रहे हैं पूरी तरह से

पर रास्ता नहीं दिख रहा है कोई छोर से ।

कुछेक मददगारों के शर्तें हजार हैं

इसलिए प्रयास में जुटे हुए हैं हर ओर से ।

सोमवार, 23 मार्च 2020

नकाबपोश चेहरे

आजकल नक़ाबों से छिपे चेहरे दिख रहे हैं।
हर चेहरे के पीछे एक नए चेहरे मिल रहे हैं।
आहिस्ता-आहिस्ता साथ चलते हैं ऐसे,
जैसे साथ में चलते हुए भी अकेले से लग रहे हैं।

वीरान-सा शहर, सूने-सूने से रास्ते
खालीपन-सी जिंदगी अब महसूस हो रहे हैं।
बातों का सिलसिला भी कुछ यूं खत्म हो रहा,
जैसे गुफ्तगू करने से भी लोग कतरा रहे हैं।

क्या अपने, क्या पराए, क्या दोस्त, क्या दुश्मन
हर कोई, हर किसी से जुदा होने का ग़म मना रहे हैं।
नहीं चाहते किसी से भी दूर रहना,
पर मजबूरियां में ही फासला बढ़ा रहे हैं।